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Sunday, May 30, 2010

मौत का सौदागर : तम्बाकू की आत्मकथा

मौत का सौदागर : तम्बाकू की आत्मकथा

वैसे तो मैं एक पौधे का नन्हा सा पत्ता हूँ और मेरे पास आतंकवादी की तरह कोई रिवाल्वर या एके ४७ रायफल , बम वगैरह भी मौजूद नहीं है पर मैं हर साल विश्व में ५० लाख लोगों को मौत के घाट उतार देता हूँ . मैं एक ऐसा सौदागर हूँ जिसे दुनियां के लगभग सभी देशों में मौत बेचने के लिए वैधानिक अनुमति मिली हुई है . मैं मौत के अपने इस व्यापर से बाकायदा एक बड़ा हिस्सा सरकारों को कर यानि टैक्स के रूप में देता हूँ.

१९४३ के पहले अमेरिका के कुछ लोग मुझे जलाकर धुम्रपान करते थे बाद में कोलंबस और अन्य यूरोपीय नाविक मुझे यूरोप ले गए और वहां मेरी प्रसिद्धि काफी बढ़ने लगी. तब लोग बाग़ यह नहीं जानते थे की मैं कितना खतरनाक हूँ. बाद में १६ वीं सदी में यूरोपीय मुझे भारत में भी ले आए और यहाँ भी मैंने अपने साम्र्याज्य को बढ़ाना शुरू किया और आज तो मैं भारत के लोगों के बीच ऐसा घुल मिल गया हूँ कि लोगों को पता ही नहीं चलता कि मैं एक आस्तीन का सांप हूँ. और एक न एक दिन मेरा सेवन करने वालों को तडपा-तडपा कर मौत के घाट उतार दूंगा. मैंने उन मूर्खों को तो यह भी यकीन दिला दिया है कि मैं उनकी परंपरा और शिष्टाचार का हिस्सा हूँ. आज घर से लेकर गावो की चौपाल तक लोग शिष्टाचार मान कर मुझे साझा कर खाते या पीते हैं पर वे यह नहीं जानते कि असल में तो मैं उन्हें, उनके बच्चों और परिवार वालों को खाने वाला हूँ. आज भारत में लगभग ५७ प्रतिशत पुरुष और ११ प्रतिशत महिलाएं अलग-अलग रूप में मेरा सेवन कर रहे हैं.

मैं कितना खतरनाक हूँ इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि मुख्य जानलेवा बीमारियों जैसे मुंह और छाती का कैंसर, ह्रदय रोग (कार्डियो वेस्कुलेर रोग), ब्लड प्रेशर का सबसे बड़ा कारण मैं हूँ. और कई स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ साथ में दे देता हूँ. मैं आज का आधुनिक भस्मासुर बन गया हूँ यह साबित करने के लिए मुझे किसी सर्वेक्षण के परिणामों का बखान करने कि जरुरत नहीं है बल्कि आप यदि अपने आस पास देखेंगे तो पता चल जायेगा कि मेरा सेवन करने वालों में मुंह पूरा नहीं खुलना, मुंह और शारीर से बदबू आना, सांसे जोर जोर से चलना, उच्चारण में अस्पष्टता, होंठ काले होना, आँखों का लाल होना, दांतों में पीलापन एवं धब्बे, काम करते वक्त सांसे फूलना, दिन भर सुस्ती छाई रहना, मुंह में छले आना, खांसी एवं सीने में घरघराहट होना जैसे कई लक्षण जरुर दिखाई देते हैं. यह भी तय है कि यदि उनका तम्बाकू सेवन इसी तरह से जारी रहा तो उनमें से किसी को मुंह का कैंसर, किसी को गले का कैंसर, किसी को फेफड़े या छाती का कैंसर, किसी को टी. बी. या किसी को नपुंसकता या अन्य कोई बीमारी जरुर हो जाएगी और वे एक भयानक और दुखदाई मौत का शिकार होंगे.

मेरे बारे में एक और खास बात यह है कि मैं सिर्फ मेरा सेवन करने वाले लोगों को ही अपना शिकार नहीं बनता हूँ बल्कि मेरा सेवन करने वालों के दोस्त, साथी, परिवार बच्चे भी मेरा शिकार बनते हैं. धुम्रपान करने लोग जो धुआं हवा में छोड़ देते हैं वह अन्य लोगों जैसे उनके दोस्त, परिवार के सदस्य और बच्चों कि नाक और मुंह में घुस जता है. यह अप्रत्यक्ष या निष्क्रिय धुम्रपान या सेकेंड हैण्ड स्मोक कहलाता है. लोगो को पता ही नहीं है कि यह भी धुम्रपान करने जितना ही खतरनाक होता है और खास तौर से बच्चों के लिए. इसकी मदद से मैं गर्भवती महिला के अजन्में बच्चे को भी नुकसान पहुंचा सकता हूँ. अप्रत्यक्ष धुम्रपान से वे सभी भिमारियां हो सकते हैं जो सक्रिय धुम्रपान से होती हैं.

मेरा मौत का साम्राज्य अब तक तो बिना किसी परेशानी के फैलता गया है और भारत में बिमारियों कि रोकथाम और इलाज पर होने वाले कुल खर्चे का ४० प्रतिशत सिर्फ मेरी वजह से होने वाली बिमारियों के इलाज में ही खर्च हो रहा है. आज माता पिता और समाज के बड़े बूढ़े बच्चों को तम्बाकू का अभिशाप उत्तराधिकार में दे रहे हैं. अभी कुछ समय पहले ही खबर छपी थी कि जकार्ता में दो साल का बच्चा एक दिन में ४० सिगरेट पीने का आदी हो गया है और उसे यह लत लगाने वाला कोई और नहीं balki उसका पिता ही था. अब दुनियां में ऐसे लोग हैं तो मेरा काम तो आसान हो ही जायेगा न !

लेकिन ऐसे भी लोग सामने आ गएँ हैं जो कि मेरे खतरनाक इरादों को पहचानते हैं और मुझे रोकने कि हिम्मत करने लगें हैं. मुझे टोकने के लिए विश्व स्वस्थ्य संगठन ने ऍफ़ सी.टी.सी. और भारत सरकार ने तम्बाकू नियंत्रण अधिनियम लागू किया है. तम्बाकू नियंत्रण कानून में सार्वजनिक स्थानों पर धुम्रपान निषेध, बच्चों को तम्बाकू के विक्रय पर प्रतिबन्ध, तम्बाकू के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष विज्ञापन पर प्रतिबन्ध, और लोगों को जागरूक करने के लिए तम्बाकू उत्पाद पर चेतावनी जैसे बहुत से प्रावधान कियें हैं और तो और मुझ पर नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण कार्यक्रम भी लागु किया है.

इन सब से मेरा थोडा तो नुकसान हुआ है पर बहुत से लोग जो कि सरकार और पुलिस में बठे है, मेरे सेवन के आदी हैं और इसलिए मेरे हिमायती भी बन गए हैं इसलिए नियंत्रण के प्रयास उतने सफल नहीं हुए हैं. इसके आलावा आम जनता में इतनी जागरूकता नहीं है कि वो मेरा रास्ता रोक लें. बहुत चालाकी से मेरी मार्केटिंग कम्पनियाँ मेरी बिक्री कम नहीं होने दे रही है वो या तो किसी फिल्म स्टार से या पत्र पत्रिकाओं में पान मसाला का विज्ञापन देकर मेरा प्रचार करने में लगी हुई हैं.
कभी कभी मुझे थोडा दर लगने लगता है कि यदि सरकार और लोग जागरूक हो गए हो फिर क्या होगा? जैसे मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के चिन्चगोहन गाँव के लोग जागरूक हो गये, अपने गाँव को उन्होंने तम्बाकू मुक्त बना लिया और मुझे मजबूरन चिन्चगोहन गाँव छोड़ कर भागना पड़ा. क्या मुझे भारत से और पुरे विश्व से भी भागना पड़ेगा?

द्वारा,
वैभव मुरहार

3 comments:

Aniruddha Pande said...

वैभव जी बहुत अच्छी बात कही आपने .

Unknown said...
This comment has been removed by the author.
Unknown said...

Samaaj aur Vishv ke uddhar ke liye prayaas kar rahe hai...

Much kudos to your Nobel cause..